जिला चंबा की कुम्हारका पंचायत के बुढ़ियाड़ी गांव की रहने वाली पूजा अपने हुनर से परंपरा और प्रगति को एक साथ बुन रही हैं। साड़ी, दुपट्टा और रुमाल पर गद्द...
रुमाल पर संस्कृति... हाथों में आत्मनिर्भरता
जिला चंबा की कुम्हारका पंचायत के बुढ़ियाड़ी गांव की रहने वाली पूजा अपने हुनर से परंपरा और प्रगति को एक साथ बुन रही हैं। साड़ी, दुपट्टा और रुमाल पर गद्दी-गद्दन की पारंपरिक छवियां और राधा-कृष्ण के मनमोहक डिजाइन उकेरकर वह न केवल पहाड़ी संस्कृति को जीवंत रख रही हैं बल्कि आत्मनिर्भरता की नई मिसाल भी पेश कर रही हैं। उनके हाथों की कढ़ाई जहां कपड़ों को नई पहचान देती है, वहीं उनके प्रयास गांव की महिलाओं के लिए रोजगार का रास्ता भी खोल रहे हैं। 25 वर्षीय पूजा का कहना है कि वह कम समय में खूबसूरत चंबा रुमाल तैयार कर लेती हैं। बारीक धागों से की गई नफासत भरी कढ़ाई, पारंपरिक आकृतियां और रंगों का संतुलन उनकी विशेष पहचान बन चुके हैं।
ग्राहक अपनी पसंद के विशेष डिजाइन भी उनसे तैयार करवाते हैं। वह बताती हैं कि एक साधारण साड़ी को अपनी कला से डिजाइनर साड़ी में बदल देना उनके लिए जुनून जैसा है। बचपन में पिता को खो चुकी पूजा ने पांच वर्ष पहले यह कला अपनी बड़ी बहन इंदु से सीखी। इंदु सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण देती हैं, जबकि उनकी माता दर्शना गृहिणी है। बहन पिता के देहांत के बाद इंदु ने छोटी बहन पूजा को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई।
पूजा ने स्नातक तक की पढ़ाई की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने इस पारंपरिक हुनर को ही अपने कॅरिअर के रूप में अपनाया और आज अपने दम पर अलग पहचान बना रही हैं। पूजा केवल खुद तक सीमित नहीं रहीं।
यह है लक्ष्य
पूजा अब अपने काम को बड़े स्तर तक ले जाना चाहती हैं। उनका सपना है कि उनकी डिजाइन की साड़ियां और रुमाल प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में अपनी अलग पहचान बनाएं। पहाड़ी संस्कृति को धागों में पिरोकर वह न केवल अपनी आजीविका चला रही हैं बल्कि पारंपरिक कला को भी नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं।
दस महिलाओं को दिया प्रशिक्षण
वह अब तक करीब 10 महिलाओं को कढ़ाई और डिजाइन का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। उनके प्रयासों से गांव की अन्य महिलाएं भी स्वरोजगार की ओर कदम बढ़ा रही हैं। पूजा का मानना है कि यदि महिलाओं को सही दिशा और अवसर मिले तो वे घर बैठे भी सम्मानजनक आय अर्जित कर सकती हैं।