जिले में डायलिसिस की जरूरत बढ़ी तो आठ बेड कम पड़ गए। 67 मरीजों का इलाज पहले से चल रहा है। 15 नए मरीज बारी के इंतजार में हैं। किडनी मरीजों के लिए हर डा...
आठ बेड पर 67 मरीजों का बोझ, 15 वेटिंग में, डायलिसिस के लिए पठानकोट की दौड़
जिले में डायलिसिस की जरूरत बढ़ी तो आठ बेड कम पड़ गए। 67 मरीजों का इलाज पहले से चल रहा है। 15 नए मरीज बारी के इंतजार में हैं। किडनी मरीजों के लिए हर डायलिसिस तारीख से जुड़ा इलाज है लेकिन सीमित क्षमता के चलते कई परिवारों को उपचार के लिए चंबा से बाहर जाना पड़ रहा है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू राजकीय मेडिकल कॉलेज का डायलिसिस यूनिट बढ़ते मरीजों के दबाव के आगे छोटा पड़ गया है। आठ बिस्तरों की सुविधा उपलब्ध है। वर्तमान में 67 मरीज नियमित डायलिसिस पर हैं। 15 मरीजों को वेटिंग में रखा गया है। डायलिसिस की जरूरत वाले मरीजों की संख्या बढ़ने के बावजूद सेंटर में बिस्तरों की संख्या नहीं बढ़ाई जा सकी है।
समय पर डायलिसिस न होने की स्थिति में मरीजों और उनके परिजनों को जिले के बाहर के अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।हरदासपुरा के मन कुमार ने बताया कि उनके पिता की किड़नी खराब हो गई थी। हर सप्ताह डायलिसिस करवाना पड़ रहा था। चंबा में नंबर न लगने के कारण टांडा और पठानकोट जाना पड़ा। बीमारी के कारण पिता की मौत हो चुकी है। यदि चंबा में ही उनका डायलिसिस हो जाता तो शायद परिजनों को ज्यादा परेशानी न उठानी पड़ती। साहो के तिलक कुमार ने बताया कि उनकी माता किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। विशेषज्ञों ने उन्हें डायलिसिस करवाने का परामर्श दिया। जब वह चंबा यूनिट में गए तो बताया गया कि बिस्तरों की संख्या कम है। उनका नंबर अभी नहीं लग सकता। उन्हें मजबूरन माता को कांगड़ा लेकर जाना पड़ा। एक मरीज का डायलिसिस करने में दो से तीन घंटे का समय लगता है। हफ्ते में दो बार मरीज को डायलिसिस करवाना पड़ता है। कई बार दूसरे दिन भी डायलिसिस करवाने की नौबत आ जाती है। उधर, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रदीप सिंह ने बताया कि डायलिसिस यूनिट में तकनीशियन और बिस्तरों की संख्या शीघ्र बढ़ाई जाएगी। यह मामला मुख्यमंत्री के ध्यान में भी लाया गया है।